
निहायत ही शरीफ लोगों का मोहल्ला है मेरा! शरीफ मोहल्ला, शराफत टपकाते हुए लोग और शराफत से लथ-पथ हम चारों.
जुलाई का महिना था, तीन दिन से बरसात हो रही थी, हर जगह पानी भर गया था. शाम के समय, मैं, सीमा(मेरी पकिया सहेली), गुडिया दी(सीमा की दीदी) और नीतू दी(मेरी चचेरी दी). हम चारों शाम होते ही किसी एक के घर पे मिलते थे, थोड़ी बतकही, थोड़ी पड़ोसन की चुगली और थोड़ी बहुत बड़ी बड़ी बातें. उस दिन मेरा आठवीं कक्षा का रिजल्ट निकला था, समोसे लेके मैं और नीतू दी सीमा के घर पहुंचे. खा रहे थे, टी वी देख रहे थे...और बाकी सब बातें तो उसके साथ चलती ही रहती थीं. चुगली इत्यादि.
टी वी पे चिरंजीवी की कोई पिक्चर आ रही थी, . उसमे वो सिगरेट के धुएं को बड़े स्टाइल से उड़ा रहा था, अचानक सीमा ने मुझसे पूछा - "ई सिगरेट पीने में क्या मजा आता होगा रे?" "मुझे क्या पता, मैंने कभी थोड़े पी है". धीरे धीरे इस उत्सुकता ने हम सबमे सिगरेट पीने की लालसा जगा दी. उद्देश्य था मात्र ये देखना की उसमे है क्या? आखिर क्या बात है इसमें? लेकिन सिगरेट आएगा कहाँ से? दूकान से? और लाएगा कौन? बलि का बकरा तो हमें ही बनना था सो बन गए. अब बात आई की इस काम को कैसे अंजाम दें की किसी को हमपर शक ना हो. अरे भाई...आखिर शरीफों का मोहल्ला है, यू नो!
सब जगह पानी लगा हुआ, हम जाएँ कैसे? लेकिन ये साली सिगरेट की तलब जो ना करवाए. घुटने भर पानी में हेलते हुए चल दिए एक झोला और छाता लिए हुए. झोला इस पूरे नाटक तो थोडा 'नार्मल' लुक देने के लिए था. रास्ते भर हम ये बतियाते रहे की उस गुमटी पर बोलना क्या है? उ ससुरा गुमटिया वाला मामाजी को जानता है, कहीं बक दिया तो? पानी हेलते हालते पहुंचे तो गुमटी बंद. अब क्या करें? वापस कैसे चले जाएँ? सरदार क्या कहेगा? खाली हाँथ आये? हम दोनों ने तय किया की पास वाले मार्केट जाकर ले आयेंगे. १.५ की.मी पानी, पांकी में टहलते हुए मार्केट पहुंचे, गुमटी खुली देख के आँखें ऐसी चमकी जैसे चाईनीज टार्च. गुमटी पर पहुंचते ही मैंने कहा ..."दू ठो सिगरेट दे दीजियेगा", "कौन बाला चाहिए?" "अरे सीमा...नानाजी कौन सा सिगरेट बोले थे रे लाने के लिए....??" "सायद विल्स बोले थे" "हाँ हाँ....दू ठो विल्स दे दीजिये" (विल्स इसलिए क्यूंकि टी वी पे बहुत एड देखा था और कुछ 'ऊँचे' लोगों को पीते हुए देखा था).
जैसे ही दूकान वाला सिगरेट हाथ में धराया, ऐसा लगा मानो ओलंपिक का टार्च हाथ में आ गया हो. दांत निपोरते हुए उसको झोला में रखकर मैंने कहा.."ई बरसतवा में सब सब्जीयो वाला भाग गया है...." (थोडा और 'नार्मल' बनाने के लिए)
लौटते समय इतनी जल्दी थी जैसे बच्चे को मेडल मिला हो और माँ को दिखाना हो ..."अम्मा...अम्मा.....ई देखो अम्मा...हमार ईनाम" "अरे हमार बिटवा....."
घर पहुंचे, वहां पहले से नीतू और गुडिया दी पलकें बिछाए हमारा इंतज़ार कर रही थीं. "ले आई??" "और न ता का ..... हम दुन्नो जायेंगे और खाली हाथ आयेंगे" खुद की पीठ थपथपाते हुए! "जल्दी चलो रूम में...हमलोग यहाँ पे पूरा सेट्टिंग कर लिए हैं". रूम में जाते ही धीरे से दरवाजा चटकाया गया, सिगरेट सुलगाया गया, एक सिगरेट में मैं और सीमा, और एक में नीतू दी और गुडिया दी. "अरे जरा स्टाइल से पीयो रे...क्या देहाती टाइप धका-धक् फूंके जा रही हो?" "ओके ओके ...ये लो...". हम छल्ला बनाने का प्रयास भी करते रह गए लेकिन कुछ बना नहीं. मिला जुला कर कुछ भी नहीं कर पाए और ये भी नहीं तय कर पाए की इसमें ऐसा क्या है? सिवाए धुंआ छोड़ने के और फेंफडे जलने के ये करती क्या है? क्या? सुकून...? न भैया...हमें तो वो न मिला. खैर...फूंकने में व्यस्त थे तभी किसी ने दरवाजा खटखटाया, शाम का समय था, सीमा की माँ शाम को दीया दिखाती थीं. अब क्या करें?? पकडे गए तो? क्या कहेंगी? लेकिन इतने मेहनत की कमाई को ऐसे कैसे फेंक दें? वो खटखटाए जा रही थीं, मन मसोस कर हमने सिगरेट बूझा दिया, साड़ी खिड़कियाँ खोल दी. आंटी जी रूम में आयीं, थोडा देर बाद बोलीं...ये रूम में कैसी बदबू है? "बदबू? कहाँ है बदबू?? अरे वो बाहर पानी लगा है ना...वहीँ से होगा" लेकिन तब तक तो वो सारा माजरा समझ चुकी थीं. आंटी बोलीं - "शरीफ घर की लडकियां यही सब करती हैं क्या? ये लाइन पूरी होने से पहले हम चारो वहां से गायब हो चुके थे. मैं और नीतू दी घर की और भागे..सीमा छत वाले कमरे में अपनी किताबें लेके भागी. उसके बाद तीन दिन तक हम उसके घर की और देखा तक नहीं.
तीन दिन बाद फिर वही चौकड़ी...चाय...चुगली और चिरंजीवी...बस सिगरेट नहीं थी. आखिर शरीफ घर की लडकियां ऐसा थोड़े करती हैं?