
माइकल और मैं!
आज एक बड़ी मजेदार बात हुई ऑफिस में! मेरे मित्र, माइकल टॉय, अपनी धर्मपत्नी, नीसीस, के जन्मदिन के उपलक्ष में मुझे न्योता दे रहे थे, उस सम्बन्ध में हमारे बीचहुई ये वार्तालाप पढ़िए -
माइकल - स्तुति, क्या तुम्हे ईमेल पे न्योता मिल गया?
स्तुति - हाँ, माइक, मिल गया, धन्यवाद!
माइकल- तुम आ रही हो ना?
स्तुति- हाँ, ज़रूर :)
माइकल- अपने कुछ मनपसंद कलाकारों के गीतों की सी डी भी ला सकती हो
स्तुति - अच्छा! बॉलीवुड चलेगा?
माइकल- हाँ, बिलकुल
माइकल - क्या तुम मदिरा सेवन करती हो?
स्तुति - नहीं
माइकल - फिर भी पार्टी के लिए लेकर आना
स्तुति - ठीक है * (संकोच के साथ)
स्तुति - लेकिन तुम्हे मुझे नाम इत्यादी बताने होंगे
माइकल - हाँ, वहां बहुत सारे लोग होंगे
माइकल - वोदका ले आना
स्तुति - किस ब्रांड की? और कहाँ मिलेगी?
माइकल - स्काई ब्रांड की....किसी भी लिकर स्टोर में मिल जाएगी
स्तुति - कितनी बोतल ?
माइकल - एक
स्तुति - और कुछ ?
माइकल - अगर मन हो तो मेरी पत्नी के लिए कोई उपहार ...और हाँ....कोई भारतीय स्नैक हो तो मज़ा आ जायेगा!
स्तुति - ज़रूर ज़रूर!
कितना अंतर है ना ... शुरुआत में अजीब सा लगा....फिर सोचा की इनकी सभ्यता में कहाँ है - 'अथिथि देवो भव' , वो बात अलग है की आजकल 'अतिथि तुम कब जाओगे' जैसी पिक्चरें भी बन रही है! :-)
हे हे.. ये तो वही बात हुयी.. मेरे घर आओगे तो क्या लाओगे और मै तुम्हारे घर आऊगा तो क्या खिलाओगे ;)
ReplyDeleteऔर अंत में 'जरूर-जरूर' कहना मजेदार था.........
ReplyDeleteहा हा हा
चलिए आपका भी टाइम आएगा तो आप भी मंगाइयेगा.
नहीं, हम नहीं मांगेगे क्यूंकि - हम उस देश के वासी हैं जिस देश में गंगा बहती है! :-)
ReplyDeleteशुरू-शुरू में मुझे भी ऐसे कल्चरल शॉक लगे थे जी.. अब समझ गया हूँ.. :)
ReplyDeleteअरे अब यही 'शुरुआत' यहाँ भी शुरू हो गयी है !
ReplyDelete'अतिथि देवो भव' से लगता है जनमानस ऊब गया
था ! बदलाव चाहता था ! बदलाव की उत्कट इच्छा इतनी
मूल्य-मीमांसा करके कहाँ चलती है !
और , फिल्म तो जैसे आने वाले भविष्य का हास्य पेश कर रही हो :) | आभार !
मेरे ऑफिस में मेरे जो सिनिअर हैं, वो मेरे बहुत अच्छे मित्र भी हैं, हम भी ऐसे ही उन्हें लिस्ट दे देते हैं सामन लाने को..... ;)
ReplyDeleteमजेदार किस्सा था ...हा हा :P
आप हमरा पोस्ट पढने आईं हमरे लिए खुसी का बात है..आप हमसे उमर में बहुत छोटा हैं, इसलिए आपको बचिया बोलेंगे.. इस्तुति बचिया, अच्छा लगा पटना का नाम सुनकर..अपना शहर का कोई भी अदमी अपने लगता है.. आपका पोस्टबहुत अच्छा लगा...अलग अलग देस का अलग सभ्यता होता है...ओही आगे चलकर हमलोग एड्जस्ट कर लेते हैं...ठीको लगने लगता है...हमरे यहाँ भी अतिथि देवो भवः का मने बदलता जा रहा है... अतिथि कब जाओगे एगो म्जाकिया सिनेमा है, सरद जोसी जी आधा पन्ना का व्यंग के ऊपर पूरा तीन घंटा का सिनेमा...
ReplyDeleteआते रहना बचिया..अभी त हम पटना जा रहे हैं..एक हफ्ता बाद लौटेंगे..
वोदका तो पानी जैसी दिखती है । नहीं नहीं, वह अर्थ नहीं था, लेकिन यहाँ पर ऐसा प्रयोग किया जा सकता है । उपहार में एक रुद्राक्ष की माला और स्नैक्स में लइया-चना । हम्म्म्म, यह ठीक रहेगा ।
ReplyDeleteरुद्राक्ष की माला....हम्म...वैसे सुझाव अछ्छा है...उसको भी ये लोग को कोई फैशन की चीज़ समझ के पहनेंगे!
ReplyDeleteफिल्म चाची चार सौ बीस में जब कमल हासन परेश रावल को भगाते है तो परेश पूछते है.. अतिथि को क्या कहते है? कमल हासन कहते है गेस्ट.. और परेश चुपचाप जाने लगते है.. फिर पलट कर कहते है याद आया.. अतिथि देवो भव:...
ReplyDeleteयानि अतिथि अब देवता नहीं रहा.. गेस्ट हो गया है..
वोदका और रुद्राक्ष की माला ले जाओ तब जीतू दादा वाले गाने की सी डी भी ले जाना.. 'तोहफा तोहफा तोहफा.. लाया लाया लाया '
"अब की बार न्यौता मिले तो घर से ही खा-पी कर निकलियेगा.."
ReplyDeleteऔर न्यौता भी मात्र विद्युदाणविक-पत्राचार पर…?
ReplyDeleteप्रत्यय संदर्भीकरण योग्य एवम् प्रथा अनुकरणीय होने का लोभ प्रथम-दृष्ट्या देती है।
वोदका की खाली बोतल में पानी भर कर ले जाईये । चढ़ा नशा भी उतर जायेगा ।
ReplyDeleteलइया-चना आधा किलो भी ले जायेंगी तो लगेगा कि पूरी पार्टी के लिये स्नैक्स आ गया है इण्डियन ।
ReplyDeleteबहुत ही दिलचस्प । आज शायद पहली बार ही पढा है आपको । आपका बिंदास लेखन पसंद आया । टल्ली पार्टी का हाल अगली पोस्ट में आ रहा है न ?
ReplyDeleteयहाँ की पार्टियां ऐसी ही होती हैं :-( ये न्योता इसलिए थोडा खटका क्यूंकि मुझे अल्कोहोल लाने के लिए कहा गया (पहले ऐसा नहीं हुआ था)! अगले पार्ट में पार्टी की विस्तृत जानकारी दी जाएगी, अभी तो हम चले पता लगाने की लिकर स्टोर किधर है.
ReplyDeleteरोचक पोस्ट है। बाकी भी पढ़नी पडेंगी लगता है।
ReplyDeleteये क्या अभी तो आपने मुझसे कहा कि आप ब्लागिंग छोड़कर हिल स्टेशन पर जा रहे हैं और फिर नेट खोलकर बैठ गए. ये तो वादाखिलाफी हो गई. फिर से लिखने लगे रोचक पोस्ट. बाकी भी पढना बाकी. जल्दी जाइए हिल स्टेशन. कमसे कम गंदगी तो साफ होगी. आपका चेला सतीश सक्सेना उर्फ लाला तो दलाली करने के आरोप में विदेश भाग रहा है.
ReplyDeleteहम अगले पोस्ट आने के बाद मौज लेने आयेंगे.. :)
ReplyDeleteमजा आ गया। पूरा ब्लॉग खंगालना पड़ेगा आपका तो।
ReplyDeleteअच्छा ब्लॉग है और उससे भी अच्छा आपका यहाँ अपनी बात प्रस्तुत करने का तरीका
ReplyDeleteहम तो इसके अगले पार्ट का इंतज़ार रहे हैं
ReplyDeleteबहुत सुंदर
ReplyDeleteबहुत ही उत्तम। अच्छा लगा पढ़कर
ReplyDeleteए ! आज राजू बिंदास के ब्लॉग पर गए थे वहाँ तुम्हारे इस पोस्ट की लिंक मिल गयी. बड़ा मजेदार लिखा है. ऐसा ही कुछ शिखा जी ने भी लिखा है अभी जल्दी... कितना अलग है न उनका कल्चर... यकदम बिंदास... वैसे जब हम दोस्त लोग पार्टी करते हैं तो ऐसे ही कंट्रीब्यूट करके :-) हम भी तुम्हे बचिया कहेंगे... तो बच्ची ! आज से हम तुमको पिछिया लिए हैं, अब हमें किसी और ब्लॉग से तुम्हारा लिंक ढूंढने का ज़रूरत नहीं पड़ेगा.
ReplyDeleteवाह! मैं तो खुद ही आज पढ़ पाया हूँ फुरसत में
ReplyDeleteमज़ेदार
इस पर, प्रिंट में चुटकी भी ली गई है देखिएगा यहाँ