
अब जब बात एअरपोर्ट की निकली है और आईये आपको अपनि पहले हवाई यात्रा का अनुभव सुनाती हूँ!
बात २००२ की है. मुझे किसी साक्षात्कार के लिए दिल्ली जाना था. पिताजी ने ट्रेन के टिकट के लिए बहुत प्रयास किये लेकिन विफल रहे! बड़ी मुश्किल से कोई मेरा साक्षात्कार लेने को तैयार था, ये मौका हाथ से न निकल जाए, यह सोच कर मेरी पहली हवाई यात्रा का प्रबंध किया गया! मेरी ख़ुशी का तो ठिकाना न रहा, जितने सगे सम्बन्धी थे सबको फ़ोन घुमा दिया और जो बच गए थे उनको माताजी ने कवर कर लिया! दो-तीन दिन में टिकट घर पे आ गया,मानो कोई लौटरी की टिकट आ गयी हो. अडोस-पड़ोस सबने देखा, लोगों ने तो फाइन प्रिंट्स तक पढ़ डाले. उसके बाद तो दिन काटे न कटे..जैसे तैसे सफ़र का दिन आया, मैंने अपने मामाजी की शादी में खरीदा हुआ जड़ी-मोती वाला सलवार कुर्ता निकला और डेंटिंग-पेंटिंग करके तैयार हो गयी, परफयूम घर में था नहीं तो भाई ने रूम फ्रेशनर ही मार दिया और हम निकल पड़े एअरपोर्ट की ओर! रास्ते में खबर आई की मेरे ननिहाल वाले भी एअरपोर्ट आ रहे हैं मुझे विदा करने, मौसी भी अपने तीनो बच्चों को लेकर पहुंची हुई थीं! अन्दर जाने से पहले मैंने सबके पैर छुए, नानी ने ११ रुपये दिए "मिठाई खाने के लिए"! सबसे विदाई लेके मैं जैसे ही काउंटर पे पहुंची, एयर लाइन स्टाफ ने मेरा टिकेट देखा और मुझसे पूछा "मैम, विंडो और आएल?" मुझे तो जैसे सांप सूंघ गया, ये क्या बोल रहा है वो? सिर्फ विंडो समझ में आया और आएल का मतलब पता था नहीं, मैंने तुरंत कहा, "इकोनोमी क्लास का जो भी हो, दे दीजिये" वो मुस्कुराया और शायद मेरी भेष-भूसा और जवाब से उसे अंदाजा लग गया की मैं पहली बार सफ़र कर रही हूँ. उसने मुझे विंडो सीट दिया. बोर्डिंग पास लेके मैं लाऊंज में पहुंची तो क्या देखा - कोई बरमूडा में है तो कोई हवाई चप्पल में. मैंने सोचा कितने फूहड़ लोग हैं, प्लेन से जाने की तमीज भी नहीं है. एक जनाब ने तो बेहूदगी की हद्द पार कर दी थी, बरमुडा बनियान उसपे काला चश्मा और कान में वाक् मन और थिरक रहे थे माइकल जैक्सन की तरह. मैंने मन ही मन कहा की इनको भी अपना खचड़पन दिखने के लिए यही जगह मिली थी? खैर...किसी तरह प्लेन पे चढ़ी और पलक झपकते ही मैं आसमान में थी! कुछ ही देर में दिल्ली उतरने की घोषणा हो गयी, दिल्ली पहुंची, वहां मुझे लेने के लिए मेरे एक मामाजी आये थे, जो ऐसे तो रेलवे स्टेशन के नाम पे कभी नहीं आये, लेकिन एयरपोर्ट पर वो धौंस ज़माने के लिए अपने दो-तीन दोस्तों को लेकर आये! सिक्यूरिटी चेक के दौरान मेरे पर्से से एक टैग लटका दिया गया था, जिसे लेके मैं दिल्ली की बसों में भी घुमती रही! हाय ... क्या दिन थे वो!!
वाह, बहुत जीवन्त चित्रण ।
ReplyDeleteबहुत ही सरल भाषा/शब्दों में बहुत ही अच्छा लिखा है...
ReplyDeleteऔर डेंटिंग पेंटिंग शब्द पढ़ कर तो मज़ा ही आ गया :)
रूम फ्रेशनर को न मालुम होगा वह कितना महत्वपूर्ण है! आसमान में उड़ेगा!
ReplyDeleteवाह.. एक कहानी अपने पास भी है हवाई जहाज कि पहली यात्रा को लेकर.. कभी मन किया तो बाचूंगा अपने ब्लॉग पर.. :)
ReplyDeleteEe vivran aisan ba ki sabke aapan pahla hawai yatra yaad aa jaai
ReplyDeleteपहली यात्रा का रोमांच और उसकी गतिविधियों का सहज चित्रण ! आभार ।
ReplyDeleteहा हा.. हमे तो अभिजीत सावन्त दिख गये थे.. हीरोगिरी दिखा रहे थे और हम एक ठो किताब पढ्ते हुये सो रहे थे.. बाकी खाये पीये कुछ भी नही.. बस बाहर ही झाकते रहे और एयर होस्टेस लोगो से तो बिल्कुल बात नही किये.. :)
ReplyDeletebahut badhiya, pasand aaya aapka yah jivant sa vivran...
ReplyDeleteबहुत ही अच्छा लिखा है...
ReplyDeleteआपके बयान की ईमानदारी पे क़ुर्बान!
ReplyDeleteधन्यवाद! अपने ज़मीन से जुड़े रहने की कोशिश रहती है, और मुझे इन छोटी छोटी बातों को याद करके बहुत संतुष्टि मिलती है!
ReplyDeleteरूप फ़्रेशनर का कोई टिकट अलग से तो नहीं लगा? सुन्दर पोस्ट!
ReplyDeletekya bolein ab
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