मेरे पिताजी सदैव किसी की भी मदद के लिए हाजिर रहते हैं, चाहे वो अखबार देने वाला हो, या घर पे गैस सिलिंडर पहुचाने वाला! पिताजी साल में दो-तीन बार गाँव का चक्कर जरुर लगते हैं...खेत-खलिहान, बगइचा, मालगुजारी इत्यादी के सिलसिले में! और जब भी वो घर जाते हैं, वहां से कुछ न कुछ जरुर लाते हैं, इस बार लाये अमरेस चाचा को! चाचाजी हमारे पडोसी हैं और उनकी आर्थिक हालत ठीक नहीं चल रही थी...वो गाँव से निकल कर ' दिल्ली' में कुछ रोजी रोटी का जुगाड़ देखना चाहते थे! उनका कहना है की नन्ह्बूटन और मेलुआ पाहिले अकेलिही गया, लेकिन अब तो सौंसे परिवार को वहां ले गया, जब गांवे आता है तो सब पे चमका के जाता है! पिताजी के समझाने के बावजूद वो दिल्ली में भाग्य आजमाना चाहते थे सो चले आये! पिताजी ने उनके दिल्ली जाने का बंदोबस्त किया, और किसी परिचित की सिक्यूरिटी एजेंसी में गार्ड की नौकरी की बात कर ली! अमरेस चाचा ख़ुशी ख़ुशी दिल्ली चल दिए!
जिनकी सीकुरिटी एजेंसी थी, वो पिताजी के पुराने मित्र थे, पिताजी ने समझा दिया की भाई, टटका-टटका गाँव से निकला है...थोडा नरम रहना! चच्चा पहुँच गए "Gladiator Security Agency" जी हाँ, सही पढ़ा आपने! पहले तीन-चार हफ्ते शायद ट्रेनिंग चलती है, ट्रेनिंग में उनको अंग्रेजी के दो-चार शब्द से परिचय करवाया गया फिर थोडा सा दिल्ली के तौर तरीके से परिचय करवाया गया जैसे की अगर शादी शुदा महिलायें जींस पैंट में दिखें तो उन्हें न घूरें, इत्यादी! चाचा पहली बार गाँव से निकले थे इसलिए उनका पहला असाईनमेंट एक छोटी आवासीय कालोनी में दिया गया! चाचा बहुत उत्साहित थे, शाम हुई, चाचा अपना झोला-झक्कड़, सतुआ पानी लेके अपने कोपचे पे पहुँच गए थे! रात के ११ बजे कालोनी का मेन गेट बंद किया, और आवाज लगायी.... "जागते रsहिएगाssss..."
ha ha ha. amres chcha ne ro Raj Kapoor ki yaad dila di. Ye foto chacha ka hi hoga na?aage ki kahani aap ne batai nahi?
ReplyDeletehaan, ye unki ki photo hai. :) last wale line se aage ke story line ka idea lag jaayega :)
ReplyDeleteha...ha...ha...ha.
ReplyDelete-
haay re Amresh Chacha :)
badhiya post
aabhaar
dhanyavaad! :)
ReplyDeleteबढ़िया लिखा है....कई चाचा याद आ गए....जाने कई लोग हैं जो आराम करने की उम्र में काम करते हैं...कोई ऐसे लोगो से बात तमीज से जाने क्यों बात नहीं करता.... बचपन में लगता था कि क्यों लोग बुढ़ापे में काम करते हैं उनके बच्चे कितने कमीने होते हैं....फिर एक दिन एक बुर्जुग सरदार जी को दुकान पर बैठे देखा तो रहा नहीं गया, पुछ बैठा अंकल आप इस उम्र में काम क्यो करते हो उन्होने एक जबरदस्त सीख दी..उन्होने कहा बेटा गांठ बांध लो. जब तक शरीर साथ दे किसी पर बोझ मत बनो..काम करोगे तो मन लगा रहेगा वरना दिन भर बुढ़ापा तंग करेगा. जब मन नहीं करेगा तो घर बैठ जाएंगे....कोई भी दो रोटी दे देगा..बेटे बहु ध्यान रखते हैं मेरा जैसे तुम अनजान होकर भी अपनो की तरह पुछ रहो हो..तो एक नए सच को देखा....यानि हर बूढ़ा मजबूर नहीं होता, पर हां हर मजबूर बूढ़ा होता है.....पूर्व में कोई बुजूर्ग काम करें तो सब बुरा मानते है, पर पश्चिम में कम लोग....
ReplyDeleteमैं आपकी पोस्ट पर आवरगी करते-करते आ गया..किसी कि रिकमडेशन पर नहीं....तीनो पोस्ट सहज और मस्त लिखी है....खैर दिल्ली होते हुए यूके पहुंच गईं हैं....बधाई हो....हवाई जहाज का सफर तो खैर अपन ने अब तक नही किया है.....विदेश दौरे में ही कर पाएंगे....देश के दौरे में तो बसों और रेल में ही मजा आता है..खैर आप ने मजबूरी मे किया पर सफर बढ़िया रहा....
आवरगी करते करते आपके ब्लॉग पर पहुंचा हुं..
खूबसूरत पोस्ट ! सहज गँवई व्यक्तित्व से परिचय हुआ !
ReplyDeleteआभार ।
ऐसे कई कैरेक्टर अपने गाँव में मैंने भी देखें हैं... पर मैं उस तरह से बयां नहीं कर सकता जैसा की आपने किया... मज़ा आ गया...
ReplyDeleteआप भी जागते रsहिएगाssss
ha ha...avashya!
ReplyDelete:)
ReplyDeleteare aage kidhar likha hai, dikh nai raha, interest badh gaya hai is mamle me aage padhne ka....
ReplyDeleteबढ़िया लिखा है....कई चाचा याद आ गए....जाने कई लोग हैं जो आराम करने की उम्र में काम करते हैं.
ReplyDeleteकल इस पोस्ट पर कमेन्ट नहीं कर पा रहा था, पता नहीं क्यों..
ReplyDeleteकैसे एक साधारण सा पोस्ट अपने भोलेपन से असाधारण हो जाता है उसकी मिसाल है ये पोस्ट.. :)
bahut bahut dhanyavaad!
ReplyDeleteजैसे अगर शादीशुदा महिलाएँ जीन्स-टॉप में दिखें…क्या समझाया है चाचा को।
ReplyDeleteऔर क्या साफ़गोई है आपकी…
वाह!
अब सोच लीजिये....बिहार के छोटे से गाँव के चाचा जो पहली बार किसी बड़े शहर गए थे...क्या क्या हुआ होगा उनके साथ :)
ReplyDeleteये पीडी की बात माननी पड़ रही है। साधारण सी लगती असाधारण सी पोस्ट! सुन्दर!
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