Wednesday, September 1, 2021

सुबह की चाय, सनराईज़ और तुम

सुबह की चाय, सनराईज़ और तुम 

पता है तीनो में कॉमन क्या है? 

तीनो बस पालक झपकते गुलाबी शाम की तरह सरक जाते हैं 

पलाश के फूलों से रंगे आसमान को को ठीक से निहार लूँ, फिर उस हलकी दरकी हुयी सफ़ेद कप से चाय की चुस्की को गले के नीचे उतार कर तुम्हे कह सकूं "थोड़ी देर और नहीं रुक सकते?"

तुम कुछ वैसे जैसे मलमल के पत्तों पर पानी की बूंदों का सँभलने से पहले ही ढलक जाना 
बुगनबेलिए के फूलों की तरह, अनमने ढंग से लिपट जाना आवारा सा

ऑटम के लाल पीले पत्ते की तरह एक छठा बिखेर कर पतझड़ में बदल जाना 

डेन्डिलायन की फाहों की तरह कहीं उड़ जाना और मैं छोटे बच्चों की तरह दोनों हाँथ हवा में ऊपर करके तुम्हे पकड़ने के लिए तुम्हारे पीछे भागती हुयी सी .. 

Monday, August 30, 2021

कश्मीरी शॉल

 


मेरी भागती हुई शाम और तुम्हारी अलसायी सी सुबह

एक असहज सा फोन कॉल जिसमे नाम मात्र भर का परिचय


फिर अचानक एक दिन मैंने तुम्हारी पीली वाली T Shirt  पर तुम्हे टोका
मुझे आज भी याद नहीं क्यों, तुम एक कॉन्टैक्ट नंबर ही तो थे

उस उमस भरी दोपहरी में पहाड़ों में सबसे दूर, झील के किनारे मैं एक लकड़ी के घरोंदे में सुकून से थी
न जाने कैसे तुम्हारे साथ बातों का तानाबाना बुनती चली गयी और मैं उसी में उलझ कर रह गयी...
सुकून तो किसी पानी के भाप सा उड़ ही गया 



कोई इतनी जल्दी कैसे इतना अपना लग सकता है?
उसे तो ये भी पता था की मुझे कैसी बातें अच्छी लगती हैं

कोई मिले बिना मुझे कैसे ऐसे जान सकता है?
वो तो बिना बोले मेरे एहसास को पढ़ ले रहा था 

कोई मुझे ऐसे कैसे अपना बना सकता है? मैंने इजाज़त दी ही कब?
ज़िद ऐसी जैसे मैंने इसी जनम में साथ देने का वचन दे दिया हो.. ढ़ीठ 

अब मन करता है की पलट कर उन पलों को लपक कर समेट लूँ और तह लगा कर रख दूँ अपनी संदूक में
और किसी सर्दी की शाम, कश्मीरी शॉल ओढ़े, हम चाय पर  मिलें  तो उसकी कुछ तहें तुम खोलना और कुछ मैं 

Friday, December 9, 2011

'लेडिस' से त्रस्त जेंट्स




हमारे देश में एक तरफ तो महिलाओं की बराबर की हिस्सेदारी की बात होती है, तो वहीँ दूसरी ओर महिलायें खुद महिला होने का फायदा उठाती हैं. जी नहीं, ये कोई नारीवाद के ऊपर लेख नहीं है...अरे महाराज पढ़िए ना आगे...

१. आपने तीन महीने पहले ट्रेन की टिकट कटवाई, लोअर बर्थ मिली, आप समय से प्लेटफार्म पहुंचे, ट्रेन में चढ़े, सामान रखा...थोडा सुस्ता कर चश्मा निकाल कर अखबार पढना चालू ही किया था की किसी 'भाई साब' ने कंधे पर ऊँगली घोंप कर कहा - "भाई साब, ऊपर वाले बर्थ पे चल जाईयेगा? 'लेडिस' हैं साथ में.

२. सुबह सुबह आप नहा धो कर इस्त्री की हुई शर्ट पहन कर घर से निकले, निकलते ही सामने एक ऑटो वाला दिखा, जिसमे सिर्फ एक ही सीट बची थी (एक सीट आपकी नजर में, ऑटो वाले की नजर से तो हर कांटी-खूंटी पर लोग लटकाए जा सकते हैं) .. थोड़े दूर आगे जाते ही किसी महिला ने रुकने के लिए हाथ दिया. आप इधर उधर देख रहे हैं, इतने में एक ऊँगली ने फिर से आपके कंधे को घोंपा और कहा "आगे चल आईये, 'लेडिस' बैठेंगी.

३. लोकल बसों में, महिलाओं के लिए कुछ सीटें आरक्षित होती हैं, जिसपे आप बैठने की जुर्रत नहीं कर सकते. इसके अलावा, ड्राइवर के सीट के आजू बाजू वाले सीट पर भी उन्ही का कब्ज़ा रहता है..गीयर बॉक्स से लेकर टूल बॉक्स तक. जैसे कोई वी आई पी लाउंज हो. ड्राइवर बस चलाने के अलावा डी जे का भी काम करता जा रहा है, बस अपनी रफ़्तार से चल रही है....ड्राइवर चींsss करके ब्रेक लगा रहा है...आप किसी तरह एक पैर पर खड़े हैं, इतने में किसी कब्रिस्तान के कब्र से निकलती हुई हाथ की तरह एक हाथ आगे बढ़ा, और आपके कंधे पे ऊँगली घोंप कर कहा "जरा साईड़ हटियेगा, 'लेडिस' को जाना है"

४. आप शाम को दफ्तर से घर जा रहे हैं, आपके पास मोटर साइकिल का कागज़ है, आपने हेलमेट पहना है, लाईसेंस दुरुस्त है, पोलुसन सर्टीफिकेट भी चिम्चिम्मी में रखा हुआ हैं, फिर भी आपको ट्राफिक वाले ने साईड़ में लिया, साथ में दो तीन दू पहिया वालों को और रोका गया जिसमे से एक स्कूटी-धारी महिला भी थीं, उनको देखते ही, मोबाईल भैन के पास खैनी पीट रहे बड़ा साहब बोले.."जाए दो इनको..". आपने गुस्ताखी में पूछ डाला की ऐसा दो भाव क्यूँ? इतने में किसी ने बेंत के डंडे से कंधे पर घोंप कर कहा ..."दिख नहीं रहा है रे अन्हरा...'लेडिस' हैं'



इंडिया साइनिंग ...जा झाड़ के!

Thursday, July 7, 2011

रैपिडेक्स टिपण्णी कोर्स - मात्र दस मिनट में टिपण्णी करना सीखें




मैंने ब्लॉग जगत के बड़े बुजुर्गों से अपने ब्लॉग को सफलता के पायदान पर ऊपर बढाने के लिए कुछ जड़ीबूटी देने को कहा था. सौ बात की एक बात पता चली की "दूसरे के ब्लॉग पर टिपियाना मत भूलना". वैसे तो बाजार में नाना प्रकार के डिक्सनरी उपलब्ध हैं लेकिन ये डिक्सनरी मार्केट में उपलब्ध बाकी डिक्सनरी से बिलकुल अलग है.

इसमें कमेन्ट को अलग अलग पार्ट में बांटा गया है. जैसे, अगर आप जल्दी में हैं, पोस्ट पढने का समय नहीं है लेकिन आप फिर भी टिपियाना चाहते हैं तो लास्ट के दो चार कमेन्ट को पढ़ कर एक "आईडिया" ले लें, और नीचे लिखे शब्द कोष में से कोई सा भी कॉपी पेस्ट कर सकते हैं. पोस्ट अगर इमोशनल लगे तो इनका प्रयोग करें - उनकी ही कविता में से दो पंक्तियाँ उठाकर - "मर्म स्पर्शी", उनके पोस्ट में से एक लाइन लेकर - "बेहतरीन", मन को छू गयी...क्या कहें, संवेदनशील कहानी, मार्मिक प्रस्तुति, स्तब्ध, आभार, साभार, संवेदनशील कहानी, दिल को छू गयी रचना, ओह...आँखें नम हो गयी इत्यादी इत्यादी. इन सबके साथ आप अपने मार्केटिंग कैमपेन को जारी रखें - आप बहुत अच्चा लिखती हैं, कृपया हमारे ब्लॉग पर भी पधारें", हमारे ब्लॉग भीगिपलकें.कौम पर आपका स्वागत है, कृपया आप भी मेरे ब्लॉग के सदस्य बने, मैं आपका बन चुका, आदि का प्रयोग स्वीकार्य है! 

क्या आपके पास लास्ट के तीन चार कमेन्ट पढ़कर 'आईडिया' लेने का समय नहीं है? कोई बात नहीं, उसका भी इलाज हमारे विश्वस्तरीय लैब में निकाला जा चूका है. वाह, खतरनाक, बेजोड़, धासू, बहुत सही है, कमाल का लिखती/लिखते हैं आप, कृपया हमारे ब्लॉग पर भी पधारें, बहुत अच्छा, बहुत अच्छी प्रस्तुति, धन्यवाद, अति सुन्दर लेख, बेहतरीन, साधुवाद, जय हिंद इत्यादी इत्यादी. संस्मरण/पर्सनल पोस्ट - बहुत सुन्दर, सुन्दर संस्मरण, अद्भुत, रोचक, रोचक वर्णन, रोचक घटना, वाह मजा आ गया, मस्त पोस्ट, भावपूर्ण, सारगर्भित, बढ़िया दृश्यंकन, अद्भुत दृष्टिकोण, आपका जवाब नहीं, धन्य हुए पढ़कर, साधुवाद, धन्यवाद, शुभकामनाएँ, इसे और आगे बढ़ाइए।, अच्छी जानकारी, दिलचस्प, सार्थक लेखन के लिए बधाई अगर आप थोडा हटके और पर्सनल कमेन्ट करना चाहते हैं तो निम्नलिखित का प्रयोग करें - "हिंदी की यूँही सेवा करते रहें", कुछ दिनों से व्यस्तता होने के कारण ब्लॉग पर नहीं आ सका माफ़ी चाहता हूँ (जैसे ही हम पलक बिछा कर बईठे ही हुए थे), आपकी लेखनी में निखार आता जा रहा है, लिखते रहें, अगली कड़ी का बेसब्री से इंतजार, आप बहुत देर से पोस्ट लिखते हैं।, आपकी इस पोस्ट पर कहने को शब्द नहीं मिल रहे, आपके ब्लॉग पर आना हमेशा ही सुखद होता है, आपके हर पोस्ट में कुछ नया जरूर होता है, आपकी लेखन शैली अद्भुत है, बहुत दिनों के बाद आज इधर आना हुआ, अच्छा लगा।, 

आशा है कि अपने सार्थक लेखन से,आप इसी तरह, ब्लाग जगत को समृद्ध करेंगे। यह पोस्ट किसी के ऊपर निजी तौर पर नहीं लिखा गया है इसलिए खिसियाईये मत, हम तो कहते हैं की दू चार ठो यहाँ बता कर ही जाईये. जा झाड के!

Sunday, May 15, 2011

बधाई हो..सरकार सुनने लगे हैं!


मेरे नाना नानी को इस महीने की नौ तारीख को थाईलैंड जाना था. जनवरी में उन्होंने अपने पासपोर्ट के लिए अप्लाई कर दिया था. नानाजी का पासपोर्ट समय पर आ गया, लेकिन नानी के पासपोर्ट में समस्या हो रही थी. क्षेत्र के पुलिस विभाग के एक अधिकारी उनसे पुलिस रिपोर्ट भेजने के लिए पैसे की मांग कर रहे थे. नानाजी कुछ पैसे तो दे चुके थे, लेकिन वो और पैसे की मांग कर रहे थे. ये सब तमाशा होते होते अप्रैल आधा बीत चला था और सब की घबराहट बढ़ रही थी, फिर ये बात मुझे पता चली. सुनके बहुत गुस्सा आया. जिस काम के लिए एक पैसे नहीं लगने चाहिए थे, इतने पैसे लगने के बाद भी दो बुजुर्गों को किस तरह 'प्रशाशन' के नाम पर दौड़ाया जा रहा है. मैंने विचार बना लिए की इस बात को मैं ऊपर तक पहुंचा के रहूंगी. मैंने खोज पड़ताल करके झारखंड के डी.जी.पी. का नंबर निकाला, उनको फोन लगाया, उन्हें अपनी समस्या बताई. उन्होंने तुरंत मुझे अपना निजी ई मेल एड्रेस और अपना सेल नंबर दिया और एक कम्प्लेन उनके ई मेल पर भेजने को कहा. मैंने उनको ई मेल भेजा, अगले तीन दिन के अन्दर नानाजी के पास विजिलेंस टीम के डी.एस,पी का फोन आया, पता चला की ईन्क्वाईरि शुरू हो चुकी है और घूसखोर पुलिस महोदय छः महीने के लिए सस्पेंड किये जा चुके हैं. इतना ही नहीं, अगले दिन बोकारो जिला के एस.पी ने खुद भी फोन करके अस्श्वासन दिया. पासपोर्ट हाँथ में आ गया और आजकल नाना नानी थाईलैंड में सैर कर रहे हैं. इस पूरी घटना ने मेरा विशवास फिर से जगा दिया है. मुझे लगता है की हमें प्रयास करने से चूकना नहीं चाहिए. सिर्फ ये कह देना की "अरे कुछ होना जाना नहीं है", सही नहीं है. आप सब भी हिम्मत बनाईये, कदम आगे बढाईये, काहे की भईया हमरे 'सरकार सुनने लगे हैं'.

Thursday, April 28, 2011

आईये आईये...पटना दरभंगा...


मुझे 'पवन' के कार्टून बहुत पसंद हैं. आज सुबह पेपर पढ़ रही थी तो इसे देखा, और देखते ही हंसी रुके नहीं रुक रही थी, तो थोडा आप सब भी हंस लीजिए! :)

Monday, April 11, 2011

बिहारफ़ोर्डवा डिक्शनरी


प्रस्तुत है - बिहार के ईस्पेसल डिक्सनरी से कुछ शब्द

" कपड़ा फींच लो, बरतन मईंस लो, ललुआ, ख़चड़ा, खच्चड़, ऐहो, सूना न, ले लोट्टा, ढ़हलेल, धुत्त मरदे, ए गो, दू गो, भकलोल, छछ्लोल, बकलाहा, का रे, टेसन (स्टेशन), चमेटा (थप्पड़), ससपेन (स्सपेंस), हम तो अकबका (चौंक) गए, जोन है सोन, जे हे से कि, कहाँ गए थे आज समवा (शाम) को?, बत्तिया बुता (बुझा) दे, सक-पका गए, और एक ठो रोटी दो, कपार (सिर), तेंदुलकरवा गर्दा मचा दिहिस, धुर् महराज, अरे बाप रे बाप, ऐने आवा हो (इधर आओ), टरका दो (टालमटोल), का हो मरदे, लैकियन (लड़कियाँ), लंपट, लटकले तो गेले बेटा (ट्रक के पीछे), चट्टी (चप्पल), रेसका (रिक्सा), ए गजोधर, बुझला बबुआ (समझे बाबू), सुनत बाड़े रे (सुनते हो), फलनवाँ-चिलनवाँ, कीन दो (ख़रीद दो), कचकाड़ा (प्लास्टिक), चिमचिमी (पोलिथिन बैग), खटिया, बनरवा (बंदर), जा झाड़ के, पतरसुक्खा (दुबला-पतला आदमी), ढ़िबरी, चुनौटी, बेंग (मेंढ़क), नरेट्टी (गरदन) चीप दो, कनगोजर, गाछ (पेड़), गुमटी (पान का दुकान), चमड़चिट्ट, लकड़सुंघा, गमछा, लुंगी, अरे तोरी के, अइजे (यहीं पर), का कीजिएगा (क्या करेंगे), दुल्हिन (दुलहन), खिसियाना (गुस्सा करना), दू सौ हो गया, लफुआ (लोफर), फर्सटिया जाना, मोछ कबड़ा, थेथड़लौजी, नरभसिया गए हैं (नरवस होना), पैना (डंडा), इनारा (कुंआ), चरचकिया (फोर व्हीलर), खिसियाना (गुस्साना), मेहरारू (बीवी), मच्छरवा भमोर लेगा (मच्छर काट लेगा), टंडेली नहीं करो, ढेर बोलोगे तो मुँहवे बकोट (नोंच) लेंगे, आँख में अंगुली हूर देंगे, चकाचक, ससुर के नाती, लोटा के पनिया, पियासल (प्यासा), ठूँस अयले रे? (खा लिए), कौंची (क्या) कर रहा है, जरलाहा, कुच्छो नहीं (कुछ नहीं), अलबलैबे, ढेर लबड़-लबड़ मत कर, गोरकी (गोरी लड़की), पतरकी (दुबली लड़की), ऐथी, अमदूर (अमरूद), आमदी (आदमी), सिंघारा (समोसा), खबसुरत, भोरे-अन्हारे, ओसारा बहार दो, ढ़ूकें, आप केने जा रहे हैं, कौलजवा नहीं जाईएगा, अनठेकानी, लंद-फंद दिस् दैट, देखिए ढ़ेर अंग्रेज़ी मत झाड़िए, लंद-फंद देवानंद, जो रे ससुर, काहे इतना खिसिया रहे हैं मरदे, ठेकुआ, निमकी, भुतला गए थे, छूछुन्दर, जुआईल, बलवा काहे नहीं कटवाते हैं, का हो जीला, ढ़िबड़ीया धुकधुका ता, थेथड़, मिज़ाज लहरा दिया, टंच माल, भईवा, पाईपवा, तनी-मनी दे दो, तरकारी, इ नारंगी में कितना बीया है, अभरी गेंद ऐने आया तो ओने बीग देंगे, बदमाशी करबे त नाली में गोत देबौ, बिस्कुटिया चाय में बोर-बोर के खाओ जी, छुच्छे काहे खा रहे हो, बहुत निम्मन बनाया है, उँघी लग रहा है, काम लटपटा गया है, बूट फुला दिए हैं, अलुआ, सुतले रह गए, माटर साहब, तखनिए से ई माथा खराब कैले है, एक्के फैट मारबौ कि खुने बीग देबे, ले बिलैया - इ का हुआ, सड़िया दो, उठा के बजाड़ देंगे, गोइठा, डेकची, कुसियार (ईख), रमतोरई (भींडी), फटफटिया (राजदूत), भात (चावल), देखलुक (देखा), दू थाप देंगे न तो मियाजे़ संट हो जाएगा, बिस्कुट मेहरा गया है, एक बैक आ गया और हम धड़फड़ा गए, फैमली (पत्नी), बगलवाली (वो), भितरगुन्ना, लतखोर, भुईयां में बैठ जाओ, मैया गे, काहे दाँत चियार रहे हो, गोर बहुत टटा रहा है, का हीत (हित), फोडिंग द कापाड़ एंड भागिंग खेते-खेते, मुझौसा, गुलकोंच(ग्लूकोज़)।"

कुछ शब्दों को आक्सफोर्ड डिक्शनरी ने भी चुरा लिया है। और कुछ बड़ी-बड़ी कंपनियाँ इन शब्दों को अपनें ब्रांड के रूप में भी यूज़ कर रही हैं। मसलन
- देखलुक - मतलब "देखना" - देख --- लुक (Look)
- किनले - मतलब "ख़रीद" - KINLEY ( Coca Cola Mineral Water)
- पैलियो - मतलब "पाया" - Palio (Fiat's Car)
- गुच्ची - मतलब "छेद" - Gucci (Fashion Products)

अब बिहार में आपका नाम कैसे बदल जाता है उसकी भी एक बानगी देखिए। यह इस्टेब्लिस्ड कनवेंशन है कि आपके नाम के पीछे आ, या, वा लगाए बिना वो संपूर्ण नहीं है। मसलन....
- राजीव - रजिब्बा
- सुशांत - सुसंत्वा
- आशीष - आसिस्वा
- राजू - रजुआ
- रंजीत - रंजीतवा
- संजय - संजय्या
- अजय - अजय्या
- श्वेता - शवेताबा

कभी-कभी माँ-बाप बच्चे के नाम का सम्मान बचाने के लिए उसके पीछे जी लगा देते है। लेकिन इसका कतई यह मतलब नहीं कि उनके नाम सुरक्षित रह जाते हैं।
- मनीष जी - मनिषजीवा
- श्याम जी - शामजीवा
- राकेश जी - राकेशाजीवा

अब अपने टाईटिल की दुर्गति देखिए।
- सिंह जी - सिंह जीवा
- झा जी - झौआ
- मिश्रा - मिसरवा
- राय जी - रायजीवा
- मंडल - मंडलबा
- तिवारी - तिवरिया

ऐसे यही भाषा हमारी पहचान भी है और आठ करोड़ प्रवासी-अप्रवासी बिहारियों की जान भी। यह शब्दकोष आज से कुछ वर्ष पहले मैंने और दुर्गेश भईया ने मिल के लिखी थी, मैं उनको भी आभार देना चाहती हूँ.

Sunday, January 16, 2011

भोजपुरी का दूसरा नाम अश्लीलता?


आजकल के भोजपुरी फिल्मों और गानों का हाल देखा है आपने? नंगा नाच बना के रख दिया है. चाहे आप गीतों के बोल देख लीजिये या फिर विडियो में नाच रही महिला के कपडे और उसके शरीर पर जूम कर रहे कैमरे का एंगील. इतना ज्यादा भौंडापन, इतनी अश्लीलता भर दी है इन लोगों ने की आप वीडीओ को देखना तो दूर, अपने बड़े-छोटों के साथ बैठ कर इन गानों को सुन तक नहीं सकते. 99% गीत द्वि-अर्थिय होते हैं. गीत के बोल भले ही 'फूल या भंवरों' की बात कर रहे हों लेकिन कैमरे का एंगील लड़की के शरीर पर ही रहेगा. हाल में सुना की कोई बारह-तेरह साल का बच्चा है, कलुआ, अश्लील गाने गाता है और उसके कैसेट की बिक्री भी खूब होती है.

पहले के दशक में भी भोजपुरी फिल्में बनती थीं, जैसे 'गंगा मईया तोहे पियरी चढ़ईबो', 'गंगा किनारे मोरा गाँव', 'दूल्हा गंगा पार के' जो की साफ़ सुथरी और सामाजिक होती थीं, जिनको आप अपने परिवार के साथ बैठ कर देख सकते थे. लेकिन आजकल की भोजपुरी फिल्मों के पोस्टर्स भी देखने लायक नहीं होते हैं.

बेचने और बिकने के लिए निर्माता, निर्देशक, हीरो-हीरोइन किसी भी स्तर पर गिर जाने की होड में लगे हैं. हाल ही में पटना में लगी एक फिल्म "लहरिया लूटs ऐ राजाजी" के 'प्रोमोशन' में आये हीरो और हीरोइन ने गाड़ी से उतरने से हॉल तक पहुंचने तक लगातार एक दूसरे का चुंबन लिया. पूछे जाने पर हीरोइन ने इसे 'बोल्ड' होना बताया और सलाह दी की बिहार के लोगों को थोडा 'बोल्ड' अर्थात शर्महीन हो जाना चाहिए.

आप अपनी आने वाली पीढ़ी को क्या सुनाना चाहेंगे? "चोली टाईट हो गईल" या "लोलीपोप लागे लू"?

Friday, December 10, 2010

हेलन का कुत्ता



ब्रूक्स की फोटो


मेरी मित्र हैं हेलन. उनके कुत्ते का नाम है 'ब्रूक्स'. हाल ही में हेलन को दस दिन के लिए दूसरे शहर जाना था और वो किसी कारणवश ब्रूक्स को अपने साथ नहीं ले जा सकती थीं. तो उन्होंने ब्रूक्स के लिए दस दिन का 'पेट होटल' (जी हाँ, सही पढ़ा आपने. यहाँ जानवरों के लिए अलग से होटल है)बुक करवाया. हेलन अभी अभी लौट के आई हैं, और आज लंच पर मैंने उत्सुक्तावश उनसे 'जानवरों के होटल' के बारे में पूछा. दस दिन का छः सौ डॉलर (खाना-पीना, टहलाना, मन बहलाना इत्यादी मिला के) और ....ब्रूक्स को 'थाईरोयेड' है जिसके लिए रोज सुबह दवाई देनी होती है और जिसका खर्चा है बारह डॉलर प्रति दिन. कुल मिला कर सात सौ बीस डॉलर दस दिन अपने कुत्ते की देखभाल करवाने का. मैंने पूछा की दवाई देने का इतना महंगा क्यूँ? उन्होंने बताया की जो लोग कुत्तों को दवाई देते/खिलाते हैं, वो खास तौर पे "ट्रेन" किये जाते है, और उस होटल में इस 'ट्रेनिंग' की सर्टिफिकेट वाले ही जानवरों को दवाई खिलाते हैं.

मैंने हेलन से कहा की इतने पैसे खर्च करने पर उन्हें अफ़सोस नहीं हुआ? इस पैसे से वो कुछ और भी कर सकती थीं. तो उन्होंने कहा की ब्रूक्स उनके बच्चे जैसा है, और वो अपने बच्चे के प्रति लापरवाही नहीं कर सकतीं. इस देश में जानवरों के प्रति जितना प्रेम और करुना भाव मैंने देखा है, उतना हम और आप सिर्फ कल्पना ही कर सकते हैं. अभी पिछले हफ्ते की बात है, मैं ऑफिस जा रही थी रास्ते में एक जगह सारी गाडियां रुकी हुई थी क्यूंकि एक छोटा सा कुत्ते का बच्चा सड़क पर भटक रहा था, जो की यहाँ के लिए असोचनीय है, गाडियां इस लिए रुक गयीं ताकि वो बच्चा किसी गाडी के नीचे न आ जाये. इतने में मैंने देखा की पुलिस और 'एनिमल कंट्रोल' की गाडी वहां आई और उस बच्चे को उठा कर सुरक्षित स्थान पर ले गयी, फिर यातायात खुला.

आपने अखबारों या समाचार में पढ़ा होगा की किसी ने अपने कुत्ते या बिल्ली के लिए अरबों-खरबों की संपत्ति छोड़ दी है, हेलन न तो अरबों की मालकिन हैं और न ही किसी बड़े अमीर खानदान से रिश्ता है उनका. हमारे आपकी तरह माध्यम वर्गीय परिवार से आती हैं लेकिन अपने जानवरों से उतना ही प्रेम करती हैं जितना एक माँ अपने बच्चे से करती है.

Saturday, November 20, 2010

अमेरिका में मुन्नी

हमारे अपार्टमेंट का वार्षिक दिवाली महोत्सव जहाँ बच्चे, बूढ़े और जवान सभी बढ़ चढ़ कर हिस्सा लेते हैं! ये गाना मैंने इन बच्चों के लिए तैयार करवाया था, तो देखिये की "मुन्नी" यहाँ अमेरिका में भी कैसे तहलका मचा रही हैं!

Tuesday, November 2, 2010

बिहारी जी.पी.एस सेवा





विज्ञान की अनगिनत सुविधाओं में से एक है जी.पी.एस., जहाँ जाना हो वहां का पता उसमे डालिए, सैटेलाईट की मदद से जी.पी.एस आपको मार्ग-दर्शन करवाएगा. ऐसी सेवा भारत के बड़े राज्यों में शुरू कर दी गयी है, लेकिन मैं सोच रही थी की यही सेवा अगर बिहार में बिहार के ही अनूठे अंदाज़ में शुरू की जायेगी तो कैसा रहेगा? हमें किस किस तरह मार्ग दर्शन करवाएगा?

जी.पी.एस ऑन करते ही कुछ आवाज़ आएगी - "कहाँ जाना है जी? आएँ?? चिरइयांटाड? आच्छा"

-"सीधे ले लीजिये, तनी सा दाहिने...हाँ हाँ ...ई का महाराज...बाएं कीजिये. चलिए ... एकदम बूझईबे नहीं करता है आपको ता". थोडा आगे जाने के बाद, "अब एकरा बाद ता हमको बूझईबे नहीं कर रहा है....एक काम कीजिये ना...गडिया रोक के कौनो से पूछ लीजिये, हर बार अईजे आकर कनफुजिया जाते हैं"
किसी तरह आप अपने गंतव्य पर पहुंचे, वहां से फिर कहीं और जाने की इच्छा हुई, जी पी एस में पता डाला, डालते ही झुंझलाते हुए जवाब मिला "का जी...दिन भर टनडेली बुझाता है आपको ?, माने नहीं सुधरीएगा?"

अब सड़क पर गड्ढे तो होंगे ही, गाडी गड्ढे में जाते ही आवाज आई "का जी? आँख है की आलू का फांक? देखाई नहीं देता है का? ई ट्रकवा वाला सब ना एकदम ओमपुरी का गाल बना के रख दिया है रोड को, सच कह रहे हैं कौनो दिन ऊ सब हमको यूज किया ना...तब देखिएगा, ससुर के नाती को नहीं पहुंचा दिए झंझारपुर के बदले भालेसरगंज न, तब कहियेगा "
आपने जी पी एस के हाँथ जोड़े और आगे का रास्ता बताने का अनुरोध किया....."अब सोझे लीजिये, आss...दूर्र मरदे....स्पीड्वा बढाईये न, का आप भी एकदम सूकसुका के चला रहे हैं. कल्हे पिन्टुआ ले गईस था, ओकर गरल फेरेण्ड के घरे, फुलटुस गंज तरफ. एतना कचरा, धूल फांके की खोंखते खोंखते दू ठो सर्किट ख़राब हो गया. आ पिछलका हफ्ता राम परवेस के बेटी के गौना वाले गाडी में ले गया था नरकटियागंज सब फिट करके , भर रास्ता सब हमरा बगल में रखल हनुमान जी के फोटो के सामने इतना अगरबत्ती आ धुंआ जलाया सब की लगा की ससुरा सब सर्किटवे स्वाहा हो जायेगा"

आप अपनी यात्रा पूरी करके घर पहुँचने ही वाले थे की सोचा साईड में रुक कर तरकारी खरीद ली जाए, लेकिन तभी आवाज आई "ढेर तिडिंग-भिडिंग मत बतियाईये, चुप चाप से घरे चलिए आ मेरा बैटरिया जो भुकभुका रहा है, ओकरा चारज में लगाईये"

"जा झाड के बचवा!!!"

Saturday, September 18, 2010

सीख



लगता है दिमाग में जंग सा लगता जा रहा है. जंग भौतिक सुख का, आरामखोरी का, पैसों का. बस सब कुछ चाहिए....किसी तरह. कभी कभी सोचती हूँ की माँ पापा ने ऐसा तो नहीं सिखाया था फिर ऐसी कैसी हो गयी मैं? स्वार्थी...
पता नहीं ये सिर्फ मेरे साथ ही होता है या सबके साथ की जब भी लाइफ में थोडा 'उड़' रही होती हूँ, तभी इश्वर ऐसी रचना रचता है की धरातल पर आ जाती हूँ. जीवन की कडवी सच्चाई आँखों के सामने तैर जाती है और मुझे आत्मचिंतन करने पर विवश कर देती है.

ऐसी ही एक घटना कुछ समय पहले मेरे साथ हुई जब मैं अपने माँ पापा और भाई के साथ वैष्णो देवी गयी थी. हमने जाने के लिए हैलिकोप्टर सेवा पहले ही बुक कर ली थी लेकिन आने का कुछ पक्का नहीं था. भवन के बाद हम सब पैदल भैरो बाबा के दर्शन करने गए, वहां से जब नीचे जाने की बारी आई, तो मैं और भाई सांझी छत के हैली पैड पर भाग के गए लेकिन उस दिन के लिए हेलिकोप्टर सेवा पूरी तरह से बुक थी सो हमें वहां से खली हाथ लौटना पड़ा. बहुत झुंझलाहट हुई, गुस्सा आया, भुनभुनाते हुए वहां से नीचे उतरना शुरू किया और थोडा आगे गयी ही थी की एक ऐसे व्यक्ति को देखा जिसे देख कर मैं ठिठक गयी, निशब्द हो गयी, और ........पता नहीं .....

वो बिहार से जाकर जालंधर में मजदूरी करता था, बायाँ हाथ नहीं था, बायाँ पैर कई बार टूट चूका था इसलिए वो भी बेकार था, अकेला था, ढेढ़ दिन पहले से ही चढाई शुरू कर दी थी, लगातार ढेढ़ दिन चलकर पूरी तरह से थक कर निढाल हो चुका था, फिर भी भैरो बाबा तक गया. और अब धीरे धीरे लंगडाते हुए नीचे उतर रहा था. एक पुराना फटा चिटा शर्ट, फटी हुई पैंट, शर्ट के बटन से लटकाया हुआ प्रसाद का बैग और कमर में खोंसी हुई एक और छोटी सी पोलिथीन..शायद उसमे थोडा सा कुछ खाने पीने का रखा हुआ था. मैंने रुक कर पूछा "आपको कोई मदद चाहिए?", उसने मना कर दिया. फिर मैंने उसके पैर में बंधी पट्टी के बारे में पूछा, उसने कहा की टूट गया है. "अगर ...प्लास्टर ..हो तो...क्या ठीक हो जायेगा?" मैंने बहुत झिझकते हुए पूछा, उसके स्वाभिमान को ठेस नहीं पहुँचाना चाहती थी. फिर उसने बताया की वो पैर इतनी बार टूट चुका है की डाक्टर जवाब दे चुके हैं. ये सब देख सुन के मेरी आत्मा रो रही थी, और मैं उसी 'माँ' से मन ही मन ये सवाल कर रही थी की क्या उनको इसका दुःख नहीं दिखता? मैंने हिम्मत जुटाई और कहा..."...मैं आपके लिए घोडा कर देती हूँ, आप उससे नीचे चले जाईये", उसने कहा "नहीं...रहने दीजिये...मैं चला जाऊँगा...मेरी किस्मत में यही है". उसके इस जवाब से मैं हतप्रभ रह गयी और मैं वहीँ किनारे बैठ कर सोचने लगी की मैं थोड़े देर पहले क्यूँ झुंझला रही थी? क्यूंकि मुझे 'हैलिकोप्टर' नहीं मिला??? छी:....

**मेरा सौभाग्य था की एक फोटो ले पायी मैं उस स्वाभिमानी व्यक्ति के साथ जिसने मुझे मेरे जीवन की इतनी बड़ी सीख दी ....आप सबके साथ वो फोटो बाँट रही हूँ!

Sunday, August 1, 2010

बाज़ार जनित बीमारियाँ





भारत में कुछ सालों से नए नए प्रकार की बीमारियाँ फ़ैल गयी हैं, जिनका इलाज करने के बजाये सभी उससे पैसा भुनाने में लगे हुए हैं! इनके नाम हैं फ्रेंडशिप डे, वैलेंटाइन डे इत्यादी. इनका जितना बुखार मैंने इंडिया में देखा है, वैसा किसी और देश में नहीं देखा है.

जनवरी से ही टी वी पर ऐसे कार्यक्रमों का तांता लग जाता है. चाहे वो कोई सीरियल ही क्यूँ ना हो, उसमे भी एक स्पेशल एपिसोड इसपर न्योछावर कर दिया जाता है! उत्पादनों के प्रचार से अखबार, रेडिओ और टी वी खचाखच भर जाता है. रेस्टुरेंट भी आकर्षक पैकेज निकाल देते हैं, फ्रेंडशिप डे के अवसर पर - चार दोस्त पर पांचवा खाए फ्री. और वैलेंटाइनस डे पर तो ऐसी साज सज्जा होती है की पूछिए मत. चारो ओर झाड-फानूस पर दिल, धड़कता हुआ दिल, लटकता हुआ दिल, तीर मार हुआ दिल, घायल दिल, जलता हुआ दिल, सब वेराईटी दिख जायेगी आपको.

मुझे तो इन सब में आर्चीज़ गैलरी की भी गहरी साज़िश लगती है जो इसी की रोजी-रोटी खाते हैं . इतने महंगे महंगे कार्ड, मग्गा और ये 'फ्रेंशिप बैंड" इत्यादी बेचते हैं, वैसे दोष हमारा भी उतना ही है, हम खरीदते हैं, तो ये बेचते हैं. मेरी नज़र से जो ५०-१०० रुपये हम इन सब चीज़ों में बर्बाद करेंगे (बर्बाद इसलिए कह रही हूँ क्यूंकि जो सच्चे दोस्त हैं उनको किसी कार्ड या बैंड की ज़रूरत नहीं है और जिन्हें है, वो सच्चे दोस्त नहीं हैं) , उन्ही पैसों से किसी का भला करें, किसी गरीब की मदद करें, घर में काम करने वालों के बच्चों के लिए कॉपी, पेंसिल इत्यादी खरीद दें, किसी रिक्शे वाले को २ पैसे ज्यादा दे दें. मानवता का भला करें! काश, इसी तरह हम "नैतिकता दिवस" या "मानवता दिवस" भी मनाते.
हम सब अपने अपने घरों से ही शुरुवात करें, अपने छोटों को समझाएं, उनको कमज़ोर और ज़रूरतमंद लोगों के प्रति और संवेदनशील बनायें तो शायद हम किसी के चेहरे पे मुस्कान ला सकते हैं.

Sunday, July 18, 2010

अमानत


आज सुबह घर पर फोन किया तो पापा ने बताया की मम्मी राशि को लेकर मार्केट गयी हैं, ये बताते हुए पापा का गला रुंध रहा था, मैं ठीक से कुछ समझ नहीं पायी लेकिन उस समय विस्तार जानकारी लेना उचित नहीं समझा. बाद में पता चला की राशी की शादी तय हो गयी है, और मम्मी उसी की तैयारी के सम्बन्ध में गयी थीं.

राशी मेरी मम्मी की सबसे पुरानी और प्रिय मित्र, सिन्धु मौसी, की बेटी है. मम्मी और मौसी एक ही कालोनी में बड़े हुए, एक ही स्कूल में गए, कॉलेज और दोनों की शादी भी लगभग आस पास ही हुई. आज बस इतना अंतर है की सिन्धु मौसी इस दुनिया में नहीं हैं, और राशि अपने नाना नानी के साथ रहती है.

करीब १८ साल पहले सिन्धु मौसी की हत्या कर दी गयी थी. उनके पति ने उन्हें जला कर मार डाला. रिपोर्ट से ये भी पता चला था उनके जले हुए शरीर पर चीनी चिपकी हुई थी. राशी तब बहुत छोटी थी, लेकिन उसे ये अच्छी तरह याद है की जब उसकी मम्मी जल रही थीं, तब उसके "पापा" उनपर चीनी छिड़क रहे थे. आरा में केस दर्ज किया गया, मेरी मम्मी भी गवाह की लिस्ट में मौजूद थीं. पापा और मम्मी ने पटना-आरा का कई सालों तक बहुत चक्कर लगाया. हत्यारे को मात्र ४ साल की सज़ा हुई.

राशी मेरे माँ पापा के लिए सिन्धु मौसी की अमानत थी. होली हो या दिवाली, अगर मेरे लिए कुछ आता तो वो राशी के लिए भी आता. मेरे घर के पूजा स्थल पर एक छोटा सा बटुआ रखा हुआ है, मम्मी बताती हैं की वो मौसी का दिया हुआ है, उनकी आखिरी गिफ्ट. मौसी बुनाई बहुत अच्छी करती थीं, उन्होंने मेरे पापा के लिए एक स्वेटर बनाया था, जिसके कई धागे निकल चुके हैं हैं लेकिन पापा ने वो आज भी घर के बड़े संदूक में बहुत संभाल कर रखा है. आज जब राशी की शादी हो रही है, माँ और पापा की आँखें नम हैं और ह्रदय भावनाओं से भरा हुआ है, कन्यादान जो करना है.

आज घर में मौसी की पुरानी यादें घूम रही हैं!

Tuesday, June 29, 2010

वो तीन लोग



कभी कभी आप अनजाने में ऐसा काम कर लेते हैं जो आप जानते हुए सोच भी नहीं सकते. कल कुछ ऐसा ही मुझसे हो गया या यूँ कहिये की मैंने कर दिया. और उस काम की 'महानता' का मुझे आज सुबह की टीम हडल में पता चला.

पिछले हफ्ते घोषणा की गयी थी की सोमवार को हमारे ऑफिस में 'टॉप इक्सेक्यूटीव्स' आने वाले हैं. ऐसी घोषणा का उद्देश्य आपको ये बताना होता है की थोडा तमीज वाले कपडे पहने, अपने डेस्क को साफ़ सुथरा रखें और 'आदमी' नज़र आयें. ऐसी घोषणाएं हमारे सेंटर के लिए बहुत आम बात है, हर महीने कुछ ना कुछ लगा रहता है. मेरे लिए कल का दिन भी वैसा ही था जैसा बाकी दिन होता है; एकदम 'नो बिग डील' जैसा. शाम को काम ख़तम करके, मैं अपने तीसरे माले के लिफ्ट के पास खड़ी थी, वहां तीन लोग और आकर खड़े हो गए. वो तीनो देखने से ही 'टॉप क्लास' वाले लग रहे थे, तो कौन सी बड़ी बात थी. रोज का ही टंटा है ये तो. मैं वहां आराम से हेडफोन लगा कर खड़ी थी. थोड़े देर बाद मैंने उन तीनो से कहा -"ये जो लिफ्ट है ना, ये दुनिया की सबसे धीमी गति से चलने वालों में से एक है, मैं सीढ़ियों से नीचे जा रही हूँ....अगर आप चाहें तो मेरे पीछे चल सकते हैं" वो तीनो लोगों ने मुझे धन्यवाद बोलकर मेरे पीछे हो लिए. सीढ़ियों पर उन्होंने मुझसे इधर उधर की बातें पूछीं, मौसम इत्यादि के बारे में. नीचे उतारकर मैं उन्हें मेन लोंबी तक ले गयी. वहां मैंने कुछ 'सीक्रेट सर्विस' वालों को देखा, थोडा चौंकी...फिर सोचा...होंगे कोई, 'नो बिग डील'.
आज सुबह हडल में बताया गया की कल जो ''टॉप इक्सेक्यूटीव्स'' आये थे, उनमे मौजूद थे - CEO of France Airlines, CEO of Honeywell, CEO of Raytheon, CEO of IBM, CEO of American Express, CEO of Tokyo Stock Exchange ...etc etc. इनके नाम की घोषणा सुरक्षा कारणों से पहले नहीं की गयी.
सुन कर पैर के नीचे से ज़मीन खिसक गयी. अभी अभी डेस्क पर लौटकर सर्च किया तो फोटो से पता लगा की 'वो' तीन लोग जिनको मैंने लिफ्ट की खासियत बताई थी, वो थे CEO of American Express, CEO of DOW Chemical और CEO of Boeing.

Thursday, June 24, 2010

सेम टू सेम


आजकल जहाँ देखिये वहीँ अंग्रेजी स्पीकिंग सेंटर खुला हुआ है. बड़े शहरों की बात छोडिये, छोटे गाँव देहात में भी जिसे भी थोड़ी बहुत अंग्रेजी आती है, वही क्लास चलता है. मेरे गाँव पर भी शिवाला पर बिसुनधरवा का बेटा क्लास चलाता है. इस बार देख कर आये, बड़ा बढियां चल रहा है छौंड़ा का बिजनेस.
बालीवुड के साथ साथ हालीवुड का हउवा भी देख ही रहे हैं, स्पाइडर मैन का मकड़ी-बबुआ बन चुका है जिसमे टोबे मैग्वायेर बोल रहे हैं - "हम तोहरा मुआ देब रे राक्छ्स!!!"

हम पिछलग्गू की तरह हर काम कर रहे हैं, उनके जैसा पहिनना चाह रहे हैं, उनके अंदाज में बतियाना चाह रहे हैं, और ये लोग तो ना जाने कब से हमारी ही शैली चुरा कर बड़े कान्फिडेंस के साथ प्रयोग कर रहे हैं. उदहारण के लिए देखिये, अमेरिकन्स जब किसी से मिलते हैं तो कहते हैं "what's up man!!", और हमारे यहाँ बच्चे बूढ़े और जवान, "का हो मर्दे!!!"
दूसरा उदहारण, "Get outta here!!", "चल भाग हियाँ से"
एक और लीजिये, "Are you out of your mind??", "बउरा गईल बाड़े का रे?"
देखा ना, सब नक़ल किया हुआ है. सेम टू सेम. हँ न त!

इसलिए, मैं अंग्रेजी सीखने के लिए लुलुआये लोगों से यहीं कहूँगी की बस ५०% मेहनत कीजिये बाकी शैली तो अपनी है ही!

जा झाड के!

Wednesday, June 23, 2010

आपको यकीन हुआ क्या?

आजकल जिस ब्लॉग पे जाते हैं, वहां ये 'ईंडली' वाले पहिले से ही अपना कमेन्ट डाले रहते हैं -

नमस्ते,

आपका बलोग पढकर अच्चा लगा । आपके चिट्ठों को इंडलि में शामिल करने से अन्य कयी चिट्ठाकारों के सम्पर्क में आने की सम्भावना ज़्यादा हैं । एक बार इंडलि देखने से आपको भी यकीन हो जायेगा ।


पहले तो इसका मतलब क्या है? जैसे, ब्लोग्वानी और ब्लोग्वार्ता, चिठ्ठा चर्चा इत्यादि तो नाम से ही समझ में आ जाते है, पर ये ईंडली? ई का है भईया?

अपने ब्लॉग पर इनका कमेन्ट देख कर अच्छा लगा था, फिर तो हर किसी के ब्लॉग पर यही कमेन्ट देखने को मिला.
सबसे मजेदार ये वाली लाइन है - "एक बार इंडलि देखने से आपको भी यकीन हो जायेगा", हो गया बाबा, विशवास हो गया हमलोग को, देखिये हम तो आपका लोगो भी अपने बिलोग पे साट दिए हैं, अब बोलिए.....आगे?

Saturday, June 19, 2010

चार शरीफ लडकियां




निहायत ही शरीफ लोगों का मोहल्ला है मेरा! शरीफ मोहल्ला, शराफत टपकाते हुए लोग और शराफत से लथ-पथ हम चारों.

जुलाई का महिना था, तीन दिन से बरसात हो रही थी, हर जगह पानी भर गया था. शाम के समय, मैं, सीमा(मेरी पकिया सहेली), गुडिया दी(सीमा की दीदी) और नीतू दी(मेरी चचेरी दी). हम चारों शाम होते ही किसी एक के घर पे मिलते थे, थोड़ी बतकही, थोड़ी पड़ोसन की चुगली और थोड़ी बहुत बड़ी बड़ी बातें. उस दिन मेरा आठवीं कक्षा का रिजल्ट निकला था, समोसे लेके मैं और नीतू दी सीमा के घर पहुंचे. खा रहे थे, टी वी देख रहे थे...और बाकी सब बातें तो उसके साथ चलती ही रहती थीं. चुगली इत्यादि.
टी वी पे चिरंजीवी की कोई पिक्चर आ रही थी, . उसमे वो सिगरेट के धुएं को बड़े स्टाइल से उड़ा रहा था, अचानक सीमा ने मुझसे पूछा - "ई सिगरेट पीने में क्या मजा आता होगा रे?" "मुझे क्या पता, मैंने कभी थोड़े पी है". धीरे धीरे इस उत्सुकता ने हम सबमे सिगरेट पीने की लालसा जगा दी. उद्देश्य था मात्र ये देखना की उसमे है क्या? आखिर क्या बात है इसमें? लेकिन सिगरेट आएगा कहाँ से? दूकान से? और लाएगा कौन? बलि का बकरा तो हमें ही बनना था सो बन गए. अब बात आई की इस काम को कैसे अंजाम दें की किसी को हमपर शक ना हो. अरे भाई...आखिर शरीफों का मोहल्ला है, यू नो!
सब जगह पानी लगा हुआ, हम जाएँ कैसे? लेकिन ये साली सिगरेट की तलब जो ना करवाए. घुटने भर पानी में हेलते हुए चल दिए एक झोला और छाता लिए हुए. झोला इस पूरे नाटक तो थोडा 'नार्मल' लुक देने के लिए था. रास्ते भर हम ये बतियाते रहे की उस गुमटी पर बोलना क्या है? उ ससुरा गुमटिया वाला मामाजी को जानता है, कहीं बक दिया तो? पानी हेलते हालते पहुंचे तो गुमटी बंद. अब क्या करें? वापस कैसे चले जाएँ? सरदार क्या कहेगा? खाली हाँथ आये? हम दोनों ने तय किया की पास वाले मार्केट जाकर ले आयेंगे. १.५ की.मी पानी, पांकी में टहलते हुए मार्केट पहुंचे, गुमटी खुली देख के आँखें ऐसी चमकी जैसे चाईनीज टार्च. गुमटी पर पहुंचते ही मैंने कहा ..."दू ठो सिगरेट दे दीजियेगा", "कौन बाला चाहिए?" "अरे सीमा...नानाजी कौन सा सिगरेट बोले थे रे लाने के लिए....??" "सायद विल्स बोले थे" "हाँ हाँ....दू ठो विल्स दे दीजिये" (विल्स इसलिए क्यूंकि टी वी पे बहुत एड देखा था और कुछ 'ऊँचे' लोगों को पीते हुए देखा था).
जैसे ही दूकान वाला सिगरेट हाथ में धराया, ऐसा लगा मानो ओलंपिक का टार्च हाथ में आ गया हो. दांत निपोरते हुए उसको झोला में रखकर मैंने कहा.."ई बरसतवा में सब सब्जीयो वाला भाग गया है...." (थोडा और 'नार्मल' बनाने के लिए)
लौटते समय इतनी जल्दी थी जैसे बच्चे को मेडल मिला हो और माँ को दिखाना हो ..."अम्मा...अम्मा.....ई देखो अम्मा...हमार ईनाम" "अरे हमार बिटवा....."
घर पहुंचे, वहां पहले से नीतू और गुडिया दी पलकें बिछाए हमारा इंतज़ार कर रही थीं. "ले आई??" "और न ता का ..... हम दुन्नो जायेंगे और खाली हाथ आयेंगे" खुद की पीठ थपथपाते हुए! "जल्दी चलो रूम में...हमलोग यहाँ पे पूरा सेट्टिंग कर लिए हैं". रूम में जाते ही धीरे से दरवाजा चटकाया गया, सिगरेट सुलगाया गया, एक सिगरेट में मैं और सीमा, और एक में नीतू दी और गुडिया दी. "अरे जरा स्टाइल से पीयो रे...क्या देहाती टाइप धका-धक् फूंके जा रही हो?" "ओके ओके ...ये लो...". हम छल्ला बनाने का प्रयास भी करते रह गए लेकिन कुछ बना नहीं. मिला जुला कर कुछ भी नहीं कर पाए और ये भी नहीं तय कर पाए की इसमें ऐसा क्या है? सिवाए धुंआ छोड़ने के और फेंफडे जलने के ये करती क्या है? क्या? सुकून...? न भैया...हमें तो वो न मिला. खैर...फूंकने में व्यस्त थे तभी किसी ने दरवाजा खटखटाया, शाम का समय था, सीमा की माँ शाम को दीया दिखाती थीं. अब क्या करें?? पकडे गए तो? क्या कहेंगी? लेकिन इतने मेहनत की कमाई को ऐसे कैसे फेंक दें? वो खटखटाए जा रही थीं, मन मसोस कर हमने सिगरेट बूझा दिया, साड़ी खिड़कियाँ खोल दी. आंटी जी रूम में आयीं, थोडा देर बाद बोलीं...ये रूम में कैसी बदबू है? "बदबू? कहाँ है बदबू?? अरे वो बाहर पानी लगा है ना...वहीँ से होगा" लेकिन तब तक तो वो सारा माजरा समझ चुकी थीं. आंटी बोलीं - "शरीफ घर की लडकियां यही सब करती हैं क्या? ये लाइन पूरी होने से पहले हम चारो वहां से गायब हो चुके थे. मैं और नीतू दी घर की और भागे..सीमा छत वाले कमरे में अपनी किताबें लेके भागी. उसके बाद तीन दिन तक हम उसके घर की और देखा तक नहीं.
तीन दिन बाद फिर वही चौकड़ी...चाय...चुगली और चिरंजीवी...बस सिगरेट नहीं थी. आखिर शरीफ घर की लडकियां ऐसा थोड़े करती हैं?

Wednesday, June 16, 2010

अलबर्ट भईया बने भोजपुरी गवईया

पब्लिक डिमांड पर पेस है .... अलबर्ट भईया का नयका गीत!

Sunday, June 13, 2010

अम्मा, पैसे भेज दिए हैं


''आप इनसे कोई भी निजी सवाल नहीं पूछ सकते, परिवार, बच्चे किसी के भी बारे में नहीं"
"अगर ये खुद कुछ बताएं तो?"
"तो इनकी बातें बहुत ध्यान पूर्वक सुने और उनका ध्यान बांटने की कोशिश करें क्यूंकि आपलोग तो थोड़े देर में यहाँ से चले जायेंगे और इनकी यादें इन्हें जीने नहीं देंगी"

शाम के करीब ७ बजे मैं और अंशुल ऑफिस से भागते भागते उस वृधाश्रम के संचालक से मिलने पहुंचे. अगले इतवार को हमारी पहली विसीट था, हम सभी वृद्ध लोगों को दोपहर का भोजन करवा रहे थे, थोड़ी बहुत उनके काम में उनकी मदद, और उनके साथ मिलकर उनके बगीचे की साफ़ सफाई भी करनी थी. घर से ऑफिस आते जाते मैं रोज़ उस वृधाश्रम को देखती थी, मोटे मोटे लोहे का गेट, ऊँची ऊँची दीवारें....एक दो बार कोशिश की अन्दर झाँकने की....विश्वास नहीं होता था की यहाँ कोई रहता भी होगा. मेरी नानी और दादी तो घर पे रहती हैं, हम सबके साथ...फिर इन्हें यहाँ कौन छोड़ सकता है? मैं तो आज भी छोटे बच्चों की तरह उनके आँचल में छुप जाती हूँ और वो आज भी मुझे गले लगा लेती हैं फिर कोई उनकी ममता से कैसे दूर रह सकता है? कुछ ऐसे ही सवाल अंशुल के मन में थे, हमने हिम्मत की, और जा पहुंचे 'आशीर्वाद' आश्रम. लेकिन ये कैसा अपवाद है? नाम है 'आशीर्वाद' लेकिन उन्हें लेने वाला कौन है यहाँ? कहाँ हैं वो अभागे लोग?

इतवार सुबह ८:३० बजे आश्रम पहुँचने का समय तय हुआ. हम ५ मित्र वहां पहुंचे, व्यवस्थापक महोदय हमें उस बड़े घर के बड़े बरामदे में लेकर गए. फिर किसी को आवाज़ लगायी, बाहर एक बूढ़े बाबा निकले. कुरता पजामा, आँखों पे चश्मा, हमें देख कर कहा - "अच्छा....आप ही हमारे लिए आये हैं...बहुत धन्यवाद" हम सबने ने एक दूसरे का चेहरा देखा, फिर उनके पीछे हो लिए. बाबा हमें बगीचे में लेकर गए और बताया की क्या क्या करना है, फिर सब्जियों का खेत भी दिखाया, वहाँ भी कुछ काम था. हम सब चुप चाप क्यारियों को साफ़ करने में लग गए. धीरे धीरे करके काफी सारे बुज़ुर्ग बाहर निकल कर हमें देख रहे थे और आपस में बातें कर रहे थे. पता नहीं क्या बात कर रहे थे...मैंने कोशिश नहीं की सुनने की. ११ बजे के आस पास बगीचे वाला काम ख़तम करके रसोई में पहुंचे. हमने चूकी भोजन प्रायोजित किया था इसलिए वहां का रसोइया ही खाना बना रहा था, हम बस थोड़ी बहुत उसकी मदद कर रहे थे. भोजन का समय हुआ, धीरे धीरे सभी लोग हॉल में आ गए, "अम्मा को ले आओ कोई", किसी ने कहा, बूढी 'अम्मा' किसी का सहारा लेकर हॉल में आ रही थीं. सफ़ेद और छोटे छोटे नीले छींट वाली सूती साडी, पूरे चेहरे पर झुर्रियां, गले में तुलसी जी की माला...ये तो बिलकुल मेरी नानी जैसी दिखती हैं. 'अम्मा' आकर एक कुर्सी पर बैठीं, उनको नीचे बैठने में दिक्कत होती थी, पीठ झुक चूकी थी. मैंने आगे बढ़कर उनके पैर छू लिए, उन्होंने सर पे हाथ रख दिया. लेकिन ये क्या? ये स्पर्श भी बिलकुल मेरी नानी और दादी जैसा है. फिर किसी ने उनसे कहा "आज ये बच्चे आये हैं हमारे लिए". 'अम्मा' कुछ नहीं बोलीं. हम सबने भोजन परोसना शुरू किया, थोडा बहुत हंसी का दौर चला. अच्छा लगा देख कर. सभी आपस में एक परिवार की तरह रह रहे थे, कितनी देखभाल करते हैं सब एक दूसरे की, इतना प्यार...

खाने के बाद मैं 'अम्मा' को पकड़कर बाहर बगीचे में ले गयी, नेपथ्य में ये भी रील चल रही थी - "आप इनसे कोई भी निजी सवाल नहीं पूछ सकते, परिवार, बच्चे किसी के भी बारे में नहीं".
'अम्मा' मुझसे मेरे बारे में पूछने लगीं, परिवार के बारे में बताते बताते अचानक से से मैं बोल पड़ी -"आप मेरी नानी और दादी जैसी दिखती हैं", कुछ गलत तो नहीं बोल दिया मैंने?
उन्होंने पूछा, "तुम्हारी नानी अपने घर पर रहती हैं?", "जी", "मामा मामी के साथ?", "जी". 'अम्मा' चुप हो गयीं और मैं भी. मैं इधर उधर देखने लगी, फूलों की बातें करने लगी. कोने से देखा तो 'अम्मा' अपने आँचल से अपनी आँखें पोंछ रही थीं और कहा "अजय भी फोने करता है" "अम्मा, पैसे भेज दिए हैं", मैंने अनसुना कर दिया और क्यारियों में कुछ खोदने लगी.